ग़ालिब, मीर, कबीर और इक़बाल की मशहूर क्लासिक शायरी (मतलब के साथ)

आज की हर शायरी की जड़ें उन उस्तादों तक जाती हैं जिन्होंने सदियों पहले ऐसी बातें कहीं जो आज भी उतनी ही सच्ची हैं। यहाँ मिर्ज़ा ग़ालिब, मीर तक़ी मीर, दाग़ देहलवी और अल्लामा इक़बाल के मशहूर शेर, और संत कबीर व रहीम के दोहे हैं। हर रचना के साथ शायर का नाम और आसान हिंदी में मतलब दिया गया है। ये सभी रचनाएँ पब्लिक डोमेन में हैं।

चाँदनी रात में पुरानी हवेली के आँगन में मुशायरा पढ़ता शायर – क्लासिक शायरी
क्लासिक शायरी – Shayarifi

मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी

मिर्ज़ा ग़ालिब (1797–1869): उर्दू ग़ज़ल के सबसे बड़े नामों में से एक। उनकी शायरी में फ़लसफ़ा, शोख़ी और दर्द एक साथ मिलते हैं।
#1

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।

— मिर्ज़ा ग़ालिब

मतलब: इंसान की ख़्वाहिशें कभी ख़त्म नहीं होतीं; कितने भी अरमान पूरे हों, दिल को कम ही लगते हैं।

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#2

दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है,
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है।

— मिर्ज़ा ग़ालिब

मतलब: शायर अपने भोले दिल से पूछता है कि उसे क्या हो गया है और इस दर्द का इलाज क्या है।

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#3

हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन,
दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है।

— मिर्ज़ा ग़ालिब

मतलब: जन्नत सच है या नहीं, पता है, फिर भी दिल बहलाने के लिए ये ख़याल अच्छा है। ग़ालिब की मशहूर शोख़ी।

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#4

इश्क़ ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया,
वर्ना हम भी आदमी थे काम के।

— मिर्ज़ा ग़ालिब

मतलब: मोहब्बत ने इतना उलझा दिया कि बाक़ी किसी काम के न रहे। हल्के अंदाज़ में गहरी बात।

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#5

रेख़्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो 'ग़ालिब',
कहते हैं अगले ज़माने में कोई 'मीर' भी था।

— मिर्ज़ा ग़ालिब

मतलब: ग़ालिब ख़ुद मानते हैं कि उर्दू शायरी (रेख़्ता) के उस्ताद अकेले वही नहीं, उनसे पहले मीर भी थे।

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मीर तक़ी मीर की शायरी

मीर तक़ी मीर (1723–1810): जिन्हें "ख़ुदा-ए-सुख़न" कहा जाता है। सादे लफ़्ज़ों में गहरा दर्द उनकी पहचान है।
#6

पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है,
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है।

— मीर तक़ी मीर

मतलब: आशिक़ का हाल पूरा बाग़ जानता है, बस वही फूल (महबूब) अनजान है जिसके लिए ये सब है।

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#7

नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए,
पंखुड़ी इक गुलाब की सी है।

— मीर तक़ी मीर

मतलब: महबूब के होंठों की कोमलता का बयान: वो गुलाब की पंखुड़ी जैसे नाज़ुक हैं।

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दाग़ देहलवी की शायरी

दाग़ देहलवी (1831–1905): ज़बान की सफ़ाई और शोख़ अंदाज़ के लिए मशहूर, जिनके कई शागिर्द बड़े शायर बने।
#8

ख़ूब पर्दा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं,
साफ़ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं।

— दाग़ देहलवी

मतलब: महबूब पर्दे के पास बैठा है: न पूरी तरह छुपता है, न सामने आता है। अदा और शर्म का ख़ूबसूरत बयान।

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अल्लामा इक़बाल की शायरी

अल्लामा इक़बाल (1877–1938): "सारे जहाँ से अच्छा" के रचयिता। उनकी शायरी आत्मबल और ऊँचे इरादों की बात करती है।
#9

ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले,
ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है।

— अल्लामा इक़बाल

मतलब: अपने आत्मबल को इतना ऊँचा करो कि क़िस्मत भी तुम्हारी मर्ज़ी से लिखी जाए।

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#10

सितारों से आगे जहाँ और भी हैं,
अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं।

— अल्लामा इक़बाल

मतलब: जो हासिल किया है, मंज़िल उससे आगे भी है; अभी और चुनौतियाँ बाक़ी हैं।

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#11

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा,
हम बुलबुलें हैं इस की ये गुलसिताँ हमारा।

— अल्लामा इक़बाल

मतलब: देशप्रेम की सबसे मशहूर पंक्तियाँ: हिंदुस्तान एक बाग़ है और हम उसकी बुलबुलें।

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संत कबीर के दोहे

संत कबीर (15वीं सदी): भक्ति आंदोलन के संत-कवि, जिनके दोहे सीधी भाषा में ज़िंदगी की सच्चाई बताते हैं।
#12

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,
जो दिल खोजा आपना, मुझसा बुरा न कोय।

— संत कबीर

मतलब: दूसरों में बुराई ढूँढने से पहले अपने अंदर झाँको; सुधार ख़ुद से शुरू होता है।

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#13

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।

— संत कबीर

मतलब: किताबें पढ़कर कोई ज्ञानी नहीं बनता; जो प्रेम के ढाई अक्षर समझ ले, वही असली विद्वान है।

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#14

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब,
पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब।

— संत कबीर

मतलब: जो काम कल करना है उसे आज करो; वक़्त का भरोसा नहीं।

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#15

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय।

— संत कबीर

मतलब: सब्र रखो; माली कितना भी पानी दे, फल अपने मौसम पर ही आता है।

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रहीम के दोहे

रहीम (1556–1627): अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना, अकबर के दरबारी और नीति के दोहों के लिए प्रसिद्ध।
#16

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय,
टूटे से फिर ना मिले, मिले गाँठ परि जाय।

— रहीम

मतलब: प्रेम का रिश्ता झटके से मत तोड़ो; टूटकर जुड़ भी जाए तो गाँठ रह जाती है।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या ग़ालिब और कबीर की शायरी शेयर करना ठीक है?

हाँ। ये रचनाएँ सदियों पुरानी हैं और पब्लिक डोमेन में हैं। बस शेयर करते वक़्त शायर का नाम ज़रूर लिखें।

Gulzar या Rahat Indori की शायरी यहाँ क्यों नहीं है?

आधुनिक शायरों की रचनाएँ कॉपीराइट में हैं, इसलिए हम उन्हें बिना अनुमति प्रकाशित नहीं करते। यहाँ सिर्फ़ पब्लिक डोमेन क्लासिक रचनाएँ हैं।

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