आज की हर शायरी की जड़ें उन उस्तादों तक जाती हैं जिन्होंने सदियों पहले ऐसी बातें कहीं जो आज भी उतनी ही सच्ची हैं। यहाँ मिर्ज़ा ग़ालिब, मीर तक़ी मीर, दाग़ देहलवी और अल्लामा इक़बाल के मशहूर शेर, और संत कबीर व रहीम के दोहे हैं। हर रचना के साथ शायर का नाम और आसान हिंदी में मतलब दिया गया है। ये सभी रचनाएँ पब्लिक डोमेन में हैं।

मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।
मतलब: इंसान की ख़्वाहिशें कभी ख़त्म नहीं होतीं; कितने भी अरमान पूरे हों, दिल को कम ही लगते हैं।
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है,
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है।
मतलब: शायर अपने भोले दिल से पूछता है कि उसे क्या हो गया है और इस दर्द का इलाज क्या है।
हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन,
दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है।
मतलब: जन्नत सच है या नहीं, पता है, फिर भी दिल बहलाने के लिए ये ख़याल अच्छा है। ग़ालिब की मशहूर शोख़ी।
इश्क़ ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया,
वर्ना हम भी आदमी थे काम के।
मतलब: मोहब्बत ने इतना उलझा दिया कि बाक़ी किसी काम के न रहे। हल्के अंदाज़ में गहरी बात।
रेख़्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो 'ग़ालिब',
कहते हैं अगले ज़माने में कोई 'मीर' भी था।
मतलब: ग़ालिब ख़ुद मानते हैं कि उर्दू शायरी (रेख़्ता) के उस्ताद अकेले वही नहीं, उनसे पहले मीर भी थे।
मीर तक़ी मीर की शायरी
पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है,
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है।
मतलब: आशिक़ का हाल पूरा बाग़ जानता है, बस वही फूल (महबूब) अनजान है जिसके लिए ये सब है।
नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए,
पंखुड़ी इक गुलाब की सी है।
मतलब: महबूब के होंठों की कोमलता का बयान: वो गुलाब की पंखुड़ी जैसे नाज़ुक हैं।
दाग़ देहलवी की शायरी
ख़ूब पर्दा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं,
साफ़ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं।
मतलब: महबूब पर्दे के पास बैठा है: न पूरी तरह छुपता है, न सामने आता है। अदा और शर्म का ख़ूबसूरत बयान।
अल्लामा इक़बाल की शायरी
ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले,
ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है।
मतलब: अपने आत्मबल को इतना ऊँचा करो कि क़िस्मत भी तुम्हारी मर्ज़ी से लिखी जाए।
सितारों से आगे जहाँ और भी हैं,
अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं।
मतलब: जो हासिल किया है, मंज़िल उससे आगे भी है; अभी और चुनौतियाँ बाक़ी हैं।
सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा,
हम बुलबुलें हैं इस की ये गुलसिताँ हमारा।
मतलब: देशप्रेम की सबसे मशहूर पंक्तियाँ: हिंदुस्तान एक बाग़ है और हम उसकी बुलबुलें।
संत कबीर के दोहे
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,
जो दिल खोजा आपना, मुझसा बुरा न कोय।
मतलब: दूसरों में बुराई ढूँढने से पहले अपने अंदर झाँको; सुधार ख़ुद से शुरू होता है।
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।
मतलब: किताबें पढ़कर कोई ज्ञानी नहीं बनता; जो प्रेम के ढाई अक्षर समझ ले, वही असली विद्वान है।
काल करे सो आज कर, आज करे सो अब,
पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब।
मतलब: जो काम कल करना है उसे आज करो; वक़्त का भरोसा नहीं।
धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय।
मतलब: सब्र रखो; माली कितना भी पानी दे, फल अपने मौसम पर ही आता है।
रहीम के दोहे
रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय,
टूटे से फिर ना मिले, मिले गाँठ परि जाय।
मतलब: प्रेम का रिश्ता झटके से मत तोड़ो; टूटकर जुड़ भी जाए तो गाँठ रह जाती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या ग़ालिब और कबीर की शायरी शेयर करना ठीक है?
हाँ। ये रचनाएँ सदियों पुरानी हैं और पब्लिक डोमेन में हैं। बस शेयर करते वक़्त शायर का नाम ज़रूर लिखें।
Gulzar या Rahat Indori की शायरी यहाँ क्यों नहीं है?
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