शादी का रिश्ता सबसे क़रीबी होता है, इसलिए उसमें आई दूरी सबसे ज़्यादा चुभती है। कभी बेरुख़ी, कभी अनकही शिकायतें और कभी ज़िम्मेदारियों का बोझ प्यार को ढक लेता है। यहाँ पति-पत्नी के रिश्ते के दर्द और उसे फिर से सँवारने की उम्मीद पर मौलिक शायरी है।

पति-पत्नी की दुख भरी शायरी
एक छत के नीचे भी हम अजनबी हो गए,
बातें तो होती हैं, पर दिल चुप हो गए।
कभी तुम मेरी हर बात पे हँसते थे,
अब मेरी ख़ामोशी भी तुम्हें नहीं दिखती।
शादी की तस्वीरों में जो मुस्कान है,
वो अब बस यादों का सामान है।
ज़िम्मेदारियों में इतना उलझ गए,
कि एक-दूसरे को ही भूल गए।
तुम्हारे होते हुए भी तन्हा हूँ मैं,
ये दर्द किसी से कहा नहीं जाता।
रिश्ते में नाराज़गी शायरी
नाराज़गी भी तुमसे है, प्यार भी तुमसे,
शिकायत भी तुमसे, इंतज़ार भी तुमसे।
एक "सॉरी" की देर थी बस,
अहम ने हमें बरसों दूर कर दिया।
तुम समझते तो बात इतनी बड़ी न होती,
हम कहते तो दूरी इतनी गहरी न होती।
रिश्ता सँवारने की उम्मीद वाली शायरी
चलो फिर से उसी मोड़ पे लौट चलें,
जहाँ हाथ थामकर हमने वादे किए थे।
टूटे धागे गाँठ से जुड़ जाते हैं,
बस दोनों तरफ़ से हाथ बढ़ाने पड़ते हैं।
आज फिर चाय साथ पीते हैं,
शायद बातों में पुराना प्यार मिल जाए।
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