कभी-कभी लगता है कि क़िस्मत हर मोड़ पर साथ छोड़ देती है: मेहनत पूरी, पर नतीजा अधूरा। ऐसे वक़्त की शिकायत भी जायज़ है और उम्मीद भी ज़रूरी। यहाँ ख़राब क़िस्मत, नसीब और उसे बदलने की हिम्मत पर मौलिक शायरी है।

ख़राब क़िस्मत शायरी
क़िस्मत से शिकायत भी क्या करें,
वो हर बार नया इम्तिहान लेती है।
जो चाहा, वो कभी मिला नहीं,
जो मिला, उसमें दिल लगा नहीं।
नसीब के खेल भी निराले हैं,
मेहनत हमारी, नतीजे किसी और के हवाले हैं।
हाथ की लकीरों से रूठ गए हैं हम,
शायद हमारी क़िस्मत अभी सोई है।
क़िस्मत बदलने वाली शायरी
क़िस्मत की लकीरें मेहनत से बदलती हैं,
हार मानने वालों की ही तक़दीर ढलती है।
आज क़िस्मत रूठी है तो क्या,
कल मेहनत उसे मना लेगी।
नसीब के भरोसे बैठे तो रह जाओगे,
कोशिश करोगे तो पहुँच जाओगे।
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